देहरादून। राजधानी देहरादून के रायपुर थाना क्षेत्र के ग्राम सोड़ा सरौली में एक निर्माण स्थल पर जेसीबी चलाकर निर्माण ध्वस्त किए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि गांव के पूर्व प्रधान प्रवेश कुमेरी ने 18 अक्टूबर की सुबह जेसीबी से संजीव सिंह पुत्र श्री जसपाल सिंह के प्लॉट पर बने पुराने कमरों और पीछे की ओर बनाई गई सुरक्षा दीवार को ध्वस्त कर दिया। घटना ने कानून-व्यवस्था, निजी संपत्ति की सुरक्षा और पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक व्यक्ति को किसी दूसरे की निर्माणाधीन संपत्ति पर जेसीबी चलाकर उसे ध्वस्त करने का अधिकार किसने दिया? यदि जमीन को लेकर कोई विवाद था, तो क्या उसके समाधान के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई? क्या संबंधित अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई थी? और यदि निर्माण अवैध था, तो क्या उसे ध्वस्त करने का कोई वैधानिक आदेश था? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
15 साल पुराने कमरों को तोड़कर नया घर बनाना चाहता था परिवार
प्राप्त जानकारी के अनुसार, संजीव सिंह के सड़क से लगे प्लॉट पर पिछले लगभग 15 वर्षों से दो कमरे बने हुए थे। संजीव इन कमरों को हटाकर वहां नया मकान बनाने की तैयारी कर रहा था। इसी क्रम में प्लॉट के पिछले हिस्से में सुरक्षा दीवार का निर्माण कराया जा रहा था।आरोप है कि 18 अक्टूबर की सुबह जेसीबी लेकर पहुंचे लोगों ने निर्माण स्थल पर तोड़फोड़ करते हुए पुराने कमरों और सुरक्षा दीवार को ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई से परिवार को आर्थिक नुकसान होने की बात कही जा रही है।
यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल निर्माण ध्वस्त किए जाने का मामला नहीं है, बल्कि कानून को अपने हाथ में लेने और किसी परिवार की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की गंभीर जांच का विषय भी है।
जमीन पर कब्जे की नीयत का आरोप, लंबे समय से धमकाने का दावा
संजीव सिंह से जुड़े पक्ष का आरोप है कि प्रवेश कुमेरी लंबे समय से उन्हें परेशान कर रहा था और जमीन को लेकर धमकियां दी जा रही थीं। यह भी दावा किया जा रहा है कि विवादित प्लॉट के पीछे स्थित पुश्तैनी जमीन पर भी प्रवेश कुमेरी का कब्जा है।परिवार के पक्ष के अनुसार, प्रवेश कुमेरी जिस जमीन को अपना बताता है, उस पर उसके स्वामित्व और अधिकार की स्थिति स्पष्ट नहीं है। संजीव पक्ष का दावा है कि संबंधित पुश्तैनी जमीन उनकी है और उस पर लंबे समय से कब्जे को लेकर विवाद चल रहा है।यह भी कहा जा रहा है कि प्रवेश कुमेरी का आवास घटनास्थल से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। हालांकि, जमीन के स्वामित्व, वास्तविक कब्जे और दोनों पक्षों के दावों की पुष्टि राजस्व अभिलेखों तथा संबंधित दस्तावेजों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल का आरोप, परिवार ने जताया जान-माल का खतरा
संजीव सिंह और उनके परिवार की ओर से प्रवेश कुमेरी तथा उसके भाइयों सुरेश कुमेरी और गणेश कुमेरी से खतरा होने की बात कही जा रही है। आरोप है कि परिवार को लगातार दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।यदि परिवार की ओर से जान-माल की धमकी की शिकायत की गई है, तो पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है कि मामले की निष्पक्ष जांच करे और खतरे की गंभीरता का आकलन कर आवश्यक सुरक्षा कदम उठाए।किसी भी नागरिक को धनबल या बाहुबल के आधार पर दूसरे व्यक्ति को डराने, धमकाने अथवा उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं है। ऐसे आरोपों पर पुलिस की निष्पक्ष कार्रवाई ही कानून के प्रति आम जनता का विश्वास बनाए रख सकती है।
पूर्व प्रधान पर पहले भी अनियमितताओं के आरोप होने का दावा
प्रवेश कुमेरी को लेकर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसके खिलाफ पहले भ्रष्टाचार और अन्य अनियमितताओं से संबंधित मामले उठ चुके हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों को वन भूमि और कथित रूप से सरकारी या अन्य सार्वजनिक भूमि पर बसाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अभिलेखों की जांच के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। यदि इन मामलों में शिकायतें या जांच संबंधी दस्तावेज मौजूद हैं, तो उनकी निष्पक्ष पड़ताल कर सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए।
प्रशासन मौन क्यों? क्या आम आदमी खुद चलाने लगा बुलडोजर?
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर है।
यदि किसी जमीन पर स्वामित्व या कब्जे का विवाद था, तो उसका समाधान राजस्व विभाग, सक्षम न्यायालय और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से किया जाना चाहिए था। किसी निजी व्यक्ति द्वारा स्वयं जेसीबी चलाकर दूसरे पक्ष के निर्माण को ध्वस्त कर देना, यदि आरोपों के अनुरूप हुआ है, तो यह गंभीर कानूनी जांच की मांग करता है।
क्या प्रवेश कुमेरी ने निर्माण ध्वस्त करने से पहले किसी सक्षम अधिकारी से अनुमति ली थी? क्या किसी न्यायालय या प्रशासनिक प्राधिकरण का आदेश मौजूद था? यदि नहीं, तो आखिर किस अधिकार के तहत यह कार्रवाई की गई?
और यदि घटना की जानकारी पुलिस-प्रशासन को दी गई थी, तो अब तक क्या कार्रवाई हुई? क्या घटनास्थल का निरीक्षण किया गया? क्या नुकसान का आकलन किया गया? क्या पीड़ित परिवार की शिकायत दर्ज कर मामले की जांच शुरू की गई?
इन सवालों पर प्रशासन की चुप्पी या कार्रवाई में देरी की स्थिति में जवाबदेही तय करना आवश्यक होगा।
पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा या दबंगई के आगे व्यवस्था नतमस्तक रहेगी?
सोड़ा सरौली का यह मामला केवल दो पक्षों के बीच जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने कानून को अपने हाथ में लेकर जेसीबी से निर्माण ध्वस्त किया है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि जमीन के स्वामित्व को लेकर विवाद है, तो राजस्व अभिलेखों और वैधानिक प्रक्रिया के आधार पर उसका समाधान किया जाना चाहिए।
संजीव सिंह और उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी पुलिस प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। मामले में निष्पक्ष जांच, घटनास्थल का निरीक्षण, क्षति का आकलन और शिकायत पर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है।
अब सवाल रायपुर पुलिस और जिला प्रशासन से है—क्या सोड़ा सरौली में कानून का राज कायम होगा, या एक परिवार अपने ही प्लॉट पर घर बनाने के अधिकार और सुरक्षा के लिए दर-दर भटकता रहेगा?प्रशासन को इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताना चाहिए कि घटना में अब तक क्या कार्रवाई की गई है और कानून के तहत आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
